Craze to Settle Abroad: गए थे अवैध तरीकों से, लौटे पक्के कागजों के साथ मगर बंद कुज्जों में

– पंजाब हो या फ्रांस। शराब पंजाबियों का पीछा क्यों नहीं छोड़ रही

– हर साल फ्रांस में शराब पीकर मरने वालों की संख्या में हो रहा है इजाफा

– एनआरआई इकबाल सिंह भट्टी की संस्था हर साल कई भारतीयों की लाशों और उनकी अस्तियों को देश लेकर आ रही है

रवि रौणखर, जालंधर
16 मई, 2019

वीरवार को पंजाब प्रेस क्लब के कांफ्रेंस टेबल पर तीन कलश पड़े थे। उनमें बंद थे तीन पंजाबी। दो नंबर से फ्रांस गए थे। मगर आए पक्के कागजों पर लेकिन कुज्जों में बंद होकर। इत्तफाक देखिए तीनों का जन्म 1973 में हुआ था। 45 साल की उम्र में चले गए। कोई चार साल पहले फ्रांस गया था तो कोई 16 साल पहले। हर साल फ्रांस में कई भारतीयों की मौत हो जाती है। जो कानूनी तौर पर वहां गए होते हैं उनकी लाशें या अस्थियां तो अपने परिजनों तक कुछ घंटों में पहुंच जाती हैं लेकिन अवैध रूप से फ्रांस में बसे भारतीयों की लाशों को भारत लाने में सालों लग जाते हैं। उन भारतीयों की लाश हो या अंतिम संस्कार कर अस्तियां भारत लानी हों, इस काम की जिम्मेदारी उठाई है अरॉर डॉन एसोसिएशन ने। इस एसोसिएशन के संस्थापक इकबाल सिंह भट्टी तीन भारतीयों की अस्तियां लेकर आजकल जालंधर पहुंचे हैं। तीन में से दो पंजाबियों के परिवारों ने तो अस्थियां ले लीं लेकिन एक का परिवार अस्थियां लेने नहीं आया।

अपरा के परिवार ने अस्थियां नहीं लीं, कहा जीते जी जिसने नहीं पूछा अब मरे हुए को हम क्यों ढोएं

प्रेस कांफ्रेंस में का परिवार तो आया लेकिन एक के परिवार वालों ने अस्थियां लेने से मना कर दिया

अस्थियां लेकर भारत आए इकबाल सिंह भट्टी ने कहा कि जालंधर के अपरा गांव के रहने वाले कुलविंदर कुमार के परिवार ने यह कहते हुए अस्थियां नहीं लीं कि जीते जी उसने हमारा हाल नहीं पूछा हम उसके मरने पर उसे क्यों ढोएं। नहीं चाहिए हमें उसकी अस्थियां।  पंजाब प्रेस क्लब में दो अन्य मृतकों दिलदार सिंह वासी सलेमपुर जिला होशियारपुर और परमजीत सिंह वासी वड्डी मियाणी जिला होशियारपुर के परिजन मौजूद थे। आंखों में आंसू थे लेकिन दशकों से बिछुड़े अपनों की अस्थियां पाकर यह संतोष था कि कम से कम उनके अंतिम संस्कार तो वह कर सकेंगे। अवैध रूप से विदेशों में मरने वाले लोगों की लाशें सालों तक वहां के मुर्दाघरों में सड़ती रहती हैं। भट्टी का कहना है कि होशियारपुर और दिल्ले के कई युवकों की लाशें पिछले एक साल से वहां मॉर्चरी में पड़ी हुई हैं।

डब्ल्यूएचओ के आंकड़े जिसमें यूरोप के देश शराब पीने में सबसे आगे हैं।

शराब पीने से मारे गए ज्यादातर भारतीय

फ्रांस में शराब पीने का खुला रिवाज है। मगर समय समय पर उसका विरोध भी होता रहा है

डब्ल्यूएचओ के मुताबिक फ्रांस दुनिया में शराब पीने के मामले में चौथे नंबर पर है। इकबाल सिंह भट्टी बताते हैं कि इन तीनों युवकों की जान शराब पीने बाद पैदा हुए हालातों में हुई। कोई ज्यादा शराब पीकर हार्ट अटैक का शिकार हो गया तो कोई शराब पीकर गिर गया और उसे जानलेवा इंजरी हो गई। तो कुछ को पहले से कोई बीमारी थी जो ज्यादा शराब पीने से बढ़ गई और जान चली गई। फ्रांस में सुबह से लेकर शाम तक ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर में तीन समय अलग अलग तरह की शराब पीने का रिवाज भी है। शराब खासकर वाइन तो फ्रांस की संस्कृति का अभिन्न अंग है। यहां 16 साल के किशोर भी वाइन और बियर पी सकते हैं जबकि भारत में यह उम्र 25 वर्ष है। फ्रांस में 15 साल से ज्यादा उम्र के मरने वाले लोगों में 11 प्रतिशत की मौत शराब के कारण ही होती है।

2003 में एक पंजाबी युवक की लाश भारत लेकर आए तब से सेवा शुरू

इकबाल सिंह भट्टी फ्रांस में पिछले 28 सालों से रह रहे हैं। अब तक 144 भारतीयों के शव या अस्थियां भारत ला चुके हैं

60 वर्षीय भट्टी बताते हैं कि 1991 में वह भी अवैध तरीके से फ्रांस में दाखिल हुए थे। पहले वहां राजमिस्त्री का काम किया और आजकल एक स्टोर पर सेल्समैन के तौर पर कार्यरत हैं। 2003 में फ्रांस में एक पंजाबी युवक लापता हो गया। वहां बने हर गुरुद्वारे में अनाउंसमेंट होने लगी। मैने उस मामले में थोड़ी ज्यादा दिलचस्पी ले ली और युवक को पेरिस से लगभग 800 किमी दूर पुर्तगाल बॉर्डर से ढूंढ लाया। जिंदा नहीं। मुर्दा। उसकी नहर से लाश बरामद हुई थी। कुछ लोग कहते हैं कि ज्यादा शराब पीने से वह नहर में गिर गया था। मैने जैसे तैसे डेड बॉडी को रजिस्टर करवाया और उसे पंजाब उसके परिवार तक पहुंचाई।

डेड बॉडी या अस्थियां पक्के कागजों पर ही आती है,

कलश पूरी तरह से सील बंद होता है। अगर सील टूटी हो तो कलश लाने वाले को जेल हो सकती है

भट्टी बताते हैं कि आप फ्रांस में बिना कागजों के दो नंबर में दाखिल तो हो सकते हैं लेकिन जब किसी की मौत हो जाती है तब उसकी असली पहचान तय किए बिना उस लाश को देश के बाहर नहीं भेजा जा सकता। अवैध रूप से फ्रांस में रह रहे भारतीयों की जब भी मौत होती है लोग मुझे संपर्क करते हैं। हमारी संस्था में अब लगभग 22 लोग जुड़ चुके हैं। हम मृतक के परिवार से संपर्क करते हैं और उसके दस्तावेज, परिवार के साथ पोटो इतियादी का बंदोबस्त करते हैं। कई दिनों या कहें तो कई महीनों की मेहनत के बाद जाकर उस मृतक की देह को रजिस्टर किया जाता है। रजिस्ट्रेशन के बाद दो रास्ते होते हैं। या तो लाश भारत भेज दी जाए या उसका संस्कार करने के बाद अस्थियां कलश में डालकर भारत रवाना की जाएं। अगर अस्थियां भेजनी होती हैं तो उसे पूरी तरह सील मर्तबान में डाला जाता है। अगर सील टूटी हुई मिल जाए तो कम से कम 6 महीने की सजा है। इसलिए इस काम को बड़ी सावधानी के साथ किया जाता है।