Jalandhar to Kinnaur a Bike Trip, Destination- The First Voter of India

– शिमला, मनाली, डलहौजी और मैक्लोडगंज के अलावा भी है हिमाचल

– 1947 के बाद देश के पहले वोटर श्याम सरन नेगी इस बार वोट डालने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखा रहे थे हालांकि फिर भी उन्होंने वोट डाला

रवि रौणखर, कल्पा/जालंधर
19 मई, 2019

देश की 17वीं लोकसभा के लिए वोटिंग का आज आखिरी दिन था। देश विदेश के मीडिया की निगाहें एक खास शख्स टिकी थीं। जी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो हैं ही लेकिन हम बात कर रहे हैं देश के पहले वोटर, 102 वर्षीय श्याम सरन नेगी की। रविवार को लोकसभा के आखिरी चरण में उन्होंने वोट डाल इतिहास रच दिया। पारंपरिक किन्नौरी टोपी और गले में खुमानी और अखरोट की माला डाल नेगी को उनके बचपन के स्कूल ले जाया गया। यह वही पोलिंग बूथ है जहां उन्होंने 68 साल पहले वोट डाला था। इस स्कूल का नाम धरोहर स्कूल है। यह लगभग 130 साल पुराना स्कूल है। यहां रेड कार्पेट बिछा उनका स्वागत किया गया। नेगी ने वोट डाली और लोगों को वोट डालने का संदेश दिया।

किन्नौर से लाइवः देश के पहले वोटर की पहली तस्वीरें

1947 में भारत के बंटवारे के बाद हुए पहले लोकसभा चुनाव में नेगी ने ही पहला वोट डाला था। चुनाव 1952 की फरवरी में रखे गए थे लेकिन उस महीने हिमाचल प्रदेश का किन्नौर जिला पूरी तरह से बर्फ से ढका होता है। सारे रास्ते बंद होते थे। इसलिए सरकार ने 1951 के अक्टूबर महीने में वहां चुनाव कराने का फैसला किया। श्याम सरन नेगी उस वक्त एक स्कूल टीचर थे और चुनाव में ड्यूटी के चलते उन्होंने सुबह 6 बजे कल्पा गांव में वोट डाला और अपने पोलिंग बूथ ड्यूटी के लिए चले गए। हालांकि नेगी को उस वक्त यह एहसास नहीं था कि वह भारत के पहले वोटर बन चुके हैं। मगर इस साल उनकी तबीयत ठीक नहीं है। उन्हें कोई बीमारी तो नहीं है लेकिन घुटने बहुत दर्द करते हैं। चलना मुश्किल है। मगर नेगी वोट डालेंगे। कुछ दिन पहले मुझे नेगी से मिलने का मौका मिला। मैं जालंधर से किन्नौर के कल्पा गांव पहुंचा। यह एक मोटरसाइकल ट्रिप था। नेगी ने जो पहली बात मुझे बताई वह यह थी कि उनका वोट डालने का मन तो है लेकिन शरीर की परेशानी के चलते वहां जाना और फोटो खिंचवाना मुझे थोड़ा पीड़ादायक लग रहा है। नेगी कहते हैं कि “फिर सोचता हूं कि आखिरी बार वोट डाल ही आता हूं”। हालांकि जब मैने उनसे कहा कि आपने अगले लोकसभा चुनाव में भी वोट डालना है तो वह हंस पड़े। बोले “
अब 102 साल हो चुके हैं। शरीर कंडम हो चुका है। साथ नहीं देता। हाथ पांव चलते रहें तो सही रहता है। घुटने भी चलते नहीं। बुढ़ापा बहुत बुरी चीज है। शरीर सही हो तो व्यक्ति रहे। वरना कुछ नहीं। मेरे घुटने में ही दर्द है। बाकी मैं ठीक हूं। कोई बीमारी नहीं है। ।”

नेगी से मिलने के लिए मैं जालंधर से मोटरसाइकिल से गया। आना जाना लगभग 1100 किमी। इस कहानी के मूल में नेगी ही हैं लेकिन इसे मैं एक यात्रा वृतांत की तरह पेश कर रहा हूं। किन्नौर अपनी अलग खूबसूरती के लिए जाना जाता है। सेब, सीधे-खड़े पहाड़, सतलुज-बसपा नदी घाटियां, चिलगोजा, किन्नौरी टोपी और नेगी सरनेम यहां की खास पहचान है।

103 साल के होने जा रहे देश के पहले वोटर श्याम सरन नेगी इस बार वोट डालने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखा रहे थे। मगर उन्होंने खराब सेहत के बावजूद 19 मई की सुबह वोट डाल कर एक और कीर्तिमान बना दिया। वे पहली लोकसभा से लेकर 17वीं लोकसभा तक हर चुनाव में वोट डालने वाले देश के पहले नागरिक बन गए हैं। देश के पहले वोटर होने के नाते नेगी को खूब शोहरत भी मिली है। मगर इस बार वह अब बढ़ती उम्र और जोड़ों में दर्द के चलते वोट देने से कतरा रहे थे लेकिन उन्होंने 19 मई को कल्पा सरकारी धरोहर स्कूल में वोट डाल दिया है। पिछले दिनों जालंधर पोस्ट और भारत भूमि के रिपोर्टर रवि रौणखर से हुई खास मुलाकात में देश की जीती जागती धरोहर बन चुके नेगी ने अंगुलियों पर दिन गिनते हुए कहा था कि “19 को ही वोटिंग है न? अब चला नहीं जाता। चुनाव वाले दिन बहुत परेशानी होती है। सच कहूं तो बुढ़ापा बहुत तक्लीफ देता है। बहुत बुरा। अब वोट डालने की मेरी इच्छा नहीं होती। बहुत भारी परेशानी लगती है। यूं तो कोई बीमारी नहीं है। बस घुटने साथ नहीं देते। मगर सोचता हूं कि आखिरी इलेक्शन है तो वोट डाल ही देता हूं।”

यह है जुलाई 1917 में जन्मे देश के पहले वोटर के दिल की बात। उन्हें जहां इस बार वोट डालने में परेशानी लग रही थी वहीं इस बात का गर्व भी है कि लोकतंत्र को स्थापित करने के लिए पहला वोट उन्होंने ही दिया था। रविवार सुबह जब उन्होंने कल्पा में वोट डाला तो उस वक्त किन्नौर जिले के आला अधिकारी, नेतागण और मीडिया का अच्छा खासा जमावड़ा था। वह अपने छोटे बेटे सीपी नेगी के साथ वोट डालने गए थे। हिमाचल की राजधानी शिमला से लगभग 235 किमी दूर किन्नौर जिले के कल्पा गांव में रहते हैं श्याम सरन नेगी। जालंधर से कल्पा लगभग 510 किमी दूर है। कल्पा किन्नौर के जिला मुख्याल्य रिकोंग पियो से ठीक 8 किमी ऊपर पहाड़ पर बसा एक गांव है। नेगी कल्पा में अपने पुराने लकड़ी के बने घर में रहते हैं। इसी गांव के प्राइमरी स्कूल में उन्होंने अक्टूबर 1951 में पहले लोकसभा चुनाव में वोट डाला था। उस वक्त उनकी उम्र 33 वर्ष थी और वह स्कूल टीचर थे।

फगवाड़ा मोहाली एक्सप्रेस वे यानी नेशनल हाइवे 344-ए के किनारे कुछ मिनट रुका

गेहूं को पंजाब में सोना भी तो कहते हैं। किसान का।
कंबाइन जिन गेहूं की बल्लियों को छोड़ देती है किसान उसे हाथ से चुन लेता है।

27 अप्रैल, 2019 की सुबह 11 बजे मोटरसाइकल पर मैं किन्नौर के लिए निकला। किन्नौर में मुझे कल्पा गांव जाना था। जो जालंधर से लगभग 510 किमी दूर है। बंगा क्रास करने के बाद फगवाड़ा मोहाली एक्सप्रेस वे यानी नेशनल हाइवे 344-ए के किनारे रुका। यहां कंबाइन से गेहूं की कटाई चल रही थी। 10 मिनट में कुछ फोटो खींचे और पानी पीकर फिर चल पड़ा। किन्नौर जाने के लिए आपको शिमला होकर जाना पड़ता है। यूं तो रोपड़ से नालागढ़, अर्की, राम शहर, तत्तापानी होकर भी एक रास्ता है जो सीधे रामपुर बुशहर के नजदीक आपको ले जाता है लेकिन वह रास्ता बहुत अच्छी हालत में नहीं है। इसलिए मैने रोपड़, बद्दी, सोलन, शिमला और नारकंडा, रामपुर से किन्नौर जाने वाला रास्ता चुना। रामपुर शिमला जिले में पड़ता है लेकिन किन्नौर वासियों के लिए यह सालों से उनके राजा की राजधानी रहा है। कल्पा यहां से लगभग 110 किमी दूर है।

सिसवां में हल्का पहाड़ी रास्ता शुरू हो जाता है, जंगल के बीच भैरों बाबा का मंदिर अलग ही दिखता है

पंजाब के सिसवां गांव और बद्दी के ठीक मध्य है भैरो बाबा का मंदिर
बद्दी एक बड़ा इंडस्ट्रियल हब है, कैडबरी की चॉकलेंट हो या कोई भी दवा सब यहां बनता है

जालंधर से पहला टर्न आप फगवाड़ा से बंगा नवांशहर रोड (फगवाड़ा मोहाली एक्सप्रेस वे) के लिए लिया और दूसरा टर्न कुराली से बद्दी रोड के लिए लेते हैं। बीच में कहीं मुड़ने की की जरूरत नहीं।  कुराली बस स्टैंड पर बाईं ओर सिसवां रोड पर मैं मुड़ गया। यहां से 4-लेन सड़क शुरू होती है। सीधा सिसवां तक जाती है। सिसवां से एक रास्ता चंडीगढ़ के लिए मुड़ जाता है तो दूसरा टू लेन रोड बद्दी के लिए। आपको बद्दी वाले रोड पर बने रहना है। सड़क अच्छी है। सिसवां से बद्दी के बीच छोटी छोटी पहाड़ियां हैं। जालंधर से सिसवां तक गाड़ियां आसानी से 90-120 की स्पीड तक चलती हैं मगर सिसवां के आगे नहीं। मोड़ों पर थोड़ा धीरे ही चलें। बद्दी बाईपास पर टी प्वाइंट से दाईं ओर मुड़ जाएं। यहां से ठीक 8.6 किमी दूर चर्निया गांव से लेफ्ट टर्न ले लें। यहां से सीधे आप कालका पहुंच जाएंगे और नेशनल हाइवे नंबर 5 से ही किन्नौर तक का अगला सफर करेंगे। नेशनल हाइवे 5 तिब्बत सीमा तक जाता है।

कालका शिमला रोड 4 लेन किया रहा है।
कालका से सोलन तक का थोड़ा सा पैच खराब था, आगे शिमला तक रास्ता साफ मिला

पहला पड़ावः हिमाचल का टॉप इंजीनियरिंग इंस्टिट्यूट “जेपी युनिवर्सिटी”

मैं जेपी युनिवर्सिटी जब पहुंचा तो रंगारंग कार्यक्रम जारी था


डॉ. हर्ष सोहल और उनके साथी फैकल्टी मेंबर। गोलगप्पे खाते हुए। यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि टीचर कौन है और स्टूडेंट कौन। उत्तर भारत में जेपी युनिवर्सिटी जैसा पढ़ाई का माहौल या कैंपस कल्चर शायद ही किसी अन्य संस्थान में हो। यहां पैसा नहीं पढ़ाई पहली प्राथमिकता है। आप जाएंगे तो खुद फील करेंगे। स्टूडेंट हों या फैकल्टी। यहां एंट्री आसान नहीं है। इस कैंपस को जिस आर्किटेक्ट ने डिजाइन किया है उसकी भी तारीफ करनी चाहिए। सिविल इंजीनियरिंग और आर्केटेक्ट के स्टूडेंट इस विश्वविद्यालय में जरुर एक बार घूमकर आएं। मार्वल।


यहां छात्रों और बाहर से आए अलग अलग म्यूजिक बैंड्स और कलाकारों ने खूब मनोरंजन किया। मुझे किसी तरह की हुल्लड़बाजी या न्यूसैंस जैसी कोई घटना नहीं दिखी। फालतू का फूहड़पन और छिछोरेबाजी भी नहीं थी। कैंपस की बनावट की भी अपनी पॉजिटिव आभा है कि यहां बच्चे पढ़ने को प्राथमिकता देते हैं। छात्रों के साथ साथ हमने भी फेस्ट का पूरा आनंद लिया।

कालका से परवाणु, धर्मपुर, कुमारहट्टी, सोलन होते हुए दिन का पहला पड़ाव था वाकनाघाट की जेपी यूनिवर्सिटी। शिमला यहां से 22 किमी दूर है। यहां के इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग में कार्यरत डॉ. हर्ष सोहल मेरे बचपन के दोस्त हैं। यूनिवर्सिटी स्टाफ कालोनी में उनके घर पर रुका। यहां पहुंचने की मेरी टाइमिंग काफी अच्छी थी। जेपी यूनिवर्सिटी का सालाना कल्चरल फेस्ट जारी था। रात 12 बजे तक कैंपस में डांस और मस्ती होती रही। जेपी यूनिवर्सिटी देश के चुनिंदा इंजीनियरिंग संस्थानों में से एक है। इसके बारे में यह भी कहा जाता है कि हिमाचल के एनआईटी हमीरपुर से पहले जेपी की सीटें भरती हैं। यहां की फैकल्टी बहुत मजबूत है। पाठकों से मेरी सलाह यही है कि आप शाम को शिमला में ही रुकें। रात को रिज का नजारा देखते ही बनता है। वहां आइसक्रीम का लुत्फ उठाएं।

शिमला से ढली, कुफरी होते हुए नारकंडा का रास्ता पकड़ें

अगर आप रात को शिमला में रुकते हैं तो विक्ट्री टनल से होते हुए ढली रोड की ओर जाएं। सुबह सुबह ट्रैफिक नहीं होती। 8 बजे के बाद यहां जाम लगना शुरू हो जाता है।
शिमला से नारकंडा जाते वक्त कुफरी से पहले ढली में सूर्योदय का नजारा
शिमला से ढली, कुफरी, नारकंडा वाली सड़क पर बने रहें
रास्ते में बारिश होती रही। नारकंडा और ठियोग के बीच मटियाना गांव अपने सेब के बगीचों के लिए मशहूर है। मटियाणा में मैने 10 मिनट का ब्रेक लिया। बूंदाबांदी बंद हो गई थी। कैमरे की बैट्री चेंज की व लगेज को खोलकर फिर बांधा। (Bike- Bajaj Dominar-400CC)

अगले दिन सुबह 5 बजे कल्पा के लिए रवाना हुआ। पहला स्टॉप था ठियोग और नारकंडा के मध्य स्थित मटियाणा गांव। यहां कुछ मिनट ही रुका। उसके बाद ब्रेक लगी नारकंडा में। शिमला से 63 किमी दूर स्थित नारकंडा था। यहां पहुंचने में 2-3 घंटे का समय लगता है। क्योंकि सुबह का समय था और ट्रैफिक बेहद कम होता है। नारकंडा में न्यू हिमालय नेगी ढाबा खाने के लिए सबसे अच्छी जगह है। यह ढाबा मेन बस स्टैंड पर मंदिर के साथ ही सटा है।

नारकंडा में ब्रेकफास्ट के बाद सतलुज का किनारा पकड़ लीजिए

नारकंडा काफी ठंडा कस्बा है। शिमला के बाद ठियोग होते हुए जब आप नारकंडा पहुंचते हैं तो आपको कंपकंपी होना लाजमी है।

सतलुज के किनारे किनारे बढ़ते रहें

पंजाब, राजस्थान की जीवनदायिनी, बेअंत ऊर्जा से भरी सतलुज नदी के पहले दर्शन। स्थान किंगल।
मैदानों की बीमारी अब पहाड़ों में भी फैलने लगी है

नारकंडा में ब्रेकफास्ट करने के बाद मैं रामपुर बुशहर से पहले किंगल गांव के पास रुका। यहां एसएसबी का ट्रेनिंग सेंटर भी है। यहां सतलुज नदी का पहला व्यू आप अपने कैमरे में कैप्चर कर सकते हैं। सतलुज नदी व्यू पर जरूर रुकें। पंजाब की जीवन दायिनी इस नदी के किनारे किनारे आप आगे बढ़ेंगे।
रामपुर क्रॉस करने के बाद मैं एक छोटे से कस्बे ज्योरी में रुका। यहां बाइक की चेन को ल्यूब्रिकेट किया। पहाड़ों पर मोटर साइकल चलती है तो उसके हर पुर्जे पर ज्यादा दबाव पड़ता है। खासकर चेन को हर 200 से 400 किमी के बीच ल्यूब्रिकेट करना न भूलें। ज्योरी से एक रास्ता सराहन के लिए कटता है। ज्योरी से 17 किमी दूर सराहन में एक शक्तिपीठ स्थित है। नाम है माता भीमा काली मंदिर। रामपुर बुशहर के राजा की कुलदेवी हैं माता भीमा काली जी। ऐसा मंदिर शायद आपने पहले कभी नहीं देखा होगा।

किन्नौर में आपका स्वागत है

एक पुराना सा माइलस्टोन आपको बताता है कि आप किन्नौर में दाखिल हो चुके हैं
किन्नौर दाखिल होने पर एक छोटा सा चैकपोस्ट भी है
तरंडा माता मंदिर

ज्योरी शिमला जिले में पड़ता है। यहां से कुछ किमी दूर किन्नौर जिले की हद शुरू हो जाती है। पुलिस चैकपोस्ट के बाद आता है श्री तरंडा माता का मंदिर। मंदिर की बहुत मान्यता है। टैक्सी ट्रक और हर लोकल वाहन यहां रुकते हैं। चाहे कोई किन्नौर से शिमला जा रहा हो या शिमला से किन्नौर। माता का प्रसाद और तिलक लगाने के बाद ही आगे का सफर शुरू करते हैं। यहां रुकना इस यात्रा का एक अटूट अंग माना जाता है। मंदिर का निर्माण बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (BRO) ने करवाया है।

दुनिया के सबसे खतरनाक रोड (सिर्फ बनावट में)

यहां सड़क तंग है। फोटो खिंचवाने के लिए रुकना भी है तो कुछ देर ही रुकें। ये रोड वाकई दुनिया में अपनी तरह के अकेले रोड हैं। इन्हें बीआरओ (बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन ने बनाया है
मैं जब किन्नौर गया उन दिनों शादी का सीजन चल रहा है। लगभग हर गांव में शादी थी। कुछ बाराती मुझे भी किन्नौर दाखिल होते ही मिल गए। ऐसे ही एक बाराती से मैने अपना भी फोटो क्लिक करवा लिया। पीछे सेल्फी लेते एक जोड़े को आप देख सकते हैं।

तरंडा माता मंदिर से दो किमी दूर ही शुरू हो जाते हैं किन्नौर के विश्व प्रसिद्ध रोड। हिस्ट्री चैनल के वर्ल्ड्स मोस्ट डेंजरस रोड्स में इन सड़कों पर एपिसोड बन चुके हैं। यहां पहाड़ तराशकर सड़क निकाली गई है। बेहद खतरनाक दिखने वाले इन रास्तों पर अक्सर सैलानी रुक कर फोटो खिंचवाते हैं। पार्किंग के लिए बहुत कम जगह है लेकिन बाइक या छोटी गाड़ियों वाले यहां रुककर फोटोशूट जरूर करते हैं। दिखने में जरूर खतरनाक लगते हैं लेकिन अगर मोड़ों पर हॉर्न का इस्तेमाल किया जाए तो यहां राइड करना काफी आसान है। यह सड़क भी बीआरओ ने बनाई है। किन्नौर तिब्बत (अब उस पर चीन का कब्जा है) के साथ सीमा सांझा करता है। सरहद तक जाने वाली सड़क की जिम्मेदारी सेना ने खुद उठा रखी है। ऐसे में सेना का काम तो हम सब जानते ही हैं और बीआरओ सेना की सड़क निर्माण संस्था है। आप यकीन मानिए किन्नौर की सड़कों पर 100 से ज्यादा स्पीड पर गाड़ियां भागती हैं। सेना पर बार बार गर्व करने का मन करता है। इसके बाद किन्नौर के गांव और कस्बे आने शुरू हो जाते हैं। किन्नौर जिले की कुल आबादी एक लाख (84298 in 2011 Census) से थोड़ी कम है। यानी पंजाब के कपूरथला शहर से भी कम। 2019 के चुनाव में यहां लगभग 58000 वोटर वोट डालने जा रहे हैं।

हाइडल प्रोजेक्ट इतने ज्यादा हैं कि पहाड़ और नदी दोनों की शक्ल ही बिगाड़ दी गई है


कई जगह हाइडल प्रोजेक्ट के चलते सुरंगों की खुदाई का मलवा सीधा नदी में फेंका जा रहा है। सुरंगों से नदी का पानी मोड़ देने से नदी की एक्वेटिक लाइफ खत्म हो जाती है। सरकार कहती है कि यहां पैदा होने वाली बिजली से जितने लोगों का भला होता है उसके आगे नेचर को होने वाला नुकसान कुछ खास नहीं है। यह एटिट्यूट अच्छा नहीं है।

सतलुज पर डैम ही डैम बने हैं हजारों मैगा वाट बिजली पैदा हो रही है, भाखड़ा से भी ज्यादा सतलुज नदी आपको रामपुर से पहले किंगल में मिल जाती है। यहां रामपुर से हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट शुरू हो जाते हैं। कुछ में रेजरवायर हैं तो कुछ अंडर ग्राउंड सुरंगों से बनाए गए हैं। नदी के पानी को जगह जगह पर रोका गया है। सुरंगों से हाइडल प्रोजेक्ट डाइवर्ट किया गया है। सबसे बड़ा प्रोजेक्ट है नाथपा झाकड़ी जहां भाखड़ा से भी ज्यादा बिजली पैदा होती है। यह प्रोजेक्ट 50 किमी के एरिया में फैला हुआ है।

सुबह शिमला से चलें तो दोपहर तक रिकोंग पियो पहुंच जाते हैं

रिकोंग पियो का टैक्सी स्टैंड। 100 फीट ऊंचा तिरंगा बैकग्राउंड में किन्नर कैलाश पर्वत की चोटियां

दोपहर तक मैं किन्नौर के जिला मुख्यालय रिकोंगपियो पहुंच चुका था। यहां के लक्की मोटर मेकेनिक से मैने मोटरसाइकल की चेन साफ कराई और उसे फिर से ल्यूब किया। कुछ लोकल पत्रकारों से बात करने के बाद मैं इस कस्बे से ठीक 8 किमी ऊपर पहाड़ पर स्थित कल्पा गांव के लिए निकल पड़ा। कल्पा में एक दो होटलों में बात की। फिर ऑनलाइन रेट चैक किए। लगभग 300 से 400 रुपए सस्ते होने पर ऑनलाइन ही होटल का कमरा बुक करवा लिया। होटल श्याम सरन नेगी के घर से लगभग 500 मीटर की दूरी पर स्थित था। शाम को मैंने पैदल सैर की। कल्पा के ठीक सामने किन्नौर का प्रसिद्ध किन्नर कैलाश पर्वत है। यहीं भगवान शिवजी से जुड़ा एक तीर्थ स्थल भी है। जिसे किन्नर कैलाश ही कहा जाता है। यहां चट्टान से बना 79 फीट ऊंचा शिवलिंग है। अगस्त में किन्नर कैलाश की यात्रा शुरू होती है।

नेगी बोले वोटिंग वाले दिन बहुत परेशानी होती है

श्याम सरन नेगी

28 अप्रैल को श्याम सरन नेगी के दोहते सुरिंदर ठाकुर से मेरी बात हो चुकी थी कि 29 अप्रैल को उनसे मिलने आ रहा हूं। 29 अप्रैल की सुबह 10 बजे मैं उनके घर पहुंच गया। कल्पा के पुराने बस स्टैंड से महज कुछ कदम की दूरी पर ही श्याम सरन नेगी का घर है। कल्पा किन्नौर के सबसे पुराने गांवों में से एक है। गांव में अब इक्का दुक्का ही पुराने घर बचे हैं। ज्यादातर गांववालों ने कंक्रीट (RCC) के घर बना लिए हैं। कल्पा की मुख्य सड़क के दोनों ओर होटलों का निर्माण जारी है। नेगी जिस घर में रहते हैं वह पत्थर और लकड़ी का बना है। 70 साल पुराने इस मकान के साथ ही सटा है नेगी के पुरखों का लगभग 200 साल पुराना एक और मकान। नेगी के घर पहुंचा तो उनके छोटे बेटे सीपी नेगी ने दरवाजा खोला। बड़े दरवाजे से दाखिल होते ही नजर लकड़ी पर की गई नक्काशी और अपनी विशेष भवन निर्माण कला से बने मकान पर पड़ती है। नेगी तो पुराने मकान में रहते हैं लेकिन उनके बेटे सीपी नेगी आंगन के उस पार पक्के घर में रहते हैं। मैं पहुंचा तो नेगी नाश्ता कर रहे थे।

उनकी बहू ने कहा ‘पिताजी नाश्ते में थोड़ा समय लगाएंगे। आप इंतजार करिए’। मैं ट्राईपॉड पर कैमरा टिका रहा था। तभी सीपी नेगी कुछ अखरोट और बादाम ले आए। बादाम खोलने के लिए ईंट और हथौड़े की जरूरत नहीं पड़ी। मूंगफली जितनी ताकत से खुल जाने वाले असली कागजी बादाम जो थे। बादाम खाते खाते नजर सामने किन्नर कैलाश की चोटियों पर पड़ी। इस पर्वत की समुद्रतल से औसतन ऊंचाई 6000 मीटर है और यहां की सबसे ऊंची चोटी 6500 मीटर ऊंची है। दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट की ऊंचाई 8,848 मीटर है और भारत की सबसे ऊंची चोटी कंचनजंगा 8586 मीटर है। यानी किन्नर कैलाश से 2.5 किमी ज्यादा।

नेगी का परिवार सदियों से इन पर्वतों के आंचल में रहता आया है। एक सदी से ज्यादा तो श्याम सरन नेगी को हो चुके हैं।

श्याम सरन नेगी के आंगन में एक सेब का पेड़ है। नीचे खेत में एक ग्रीन हाउस (पॉली हाउस) बना है। सामने किन्नर कैलाश के पर्वत।

मेरा ध्यान किन्नर कैलाश की चोटियों की ओर था कि सीपी नेगी की आवाज आई। अगर शॉट लेना है तो ले लीजिए पिताजी सीढ़ियां उतरकर आ रहे हैं। मेरी नजर श्याम सरन नेगी पर पड़ी। हाथ में छड़ी। सिर पर हरे रंग की किन्नौरी टोपी। स्वैटर और ऊपर कोट पहने नेगी चार सीढ़ियां तो चलकर उतर गए। मगर उसके बाद वह बैठकर सारी सीढ़ियां उतरने लगे और बरामदे में रखे तख्त पर बैठ गए। मुझे देखते ही उनके चेहरे पर एक मुस्कान दौड़ पड़ी। हालांकि चुनाव के सीजन में अक्सर लोग उनसे मिलने आते हैं। नेगी भी दर्जनों इंटरव्यू दे चुके हैं। उनके बहुत सारे वीडियोज में लगभग एक जैसी बातें ही रिपीट थीं। नेगी की एक आंख और एक कान ने काम करना बंद कर दिया है। मगर फिर भी उनकी सुनने और देखने की क्षमता अदभुत है। मगर नेगी साहब ने मेरे साथ बातचीत में कई नई बातों का जिक्र किया। नीचे वीडियो में आप देख सकते हैं।

102 वर्षीय नेगी से रवि रौणखर ने जब पूछा कि एक वोट क्या है तो नेगी बोले- सही उम्मीदवार को पड़े तो देशहित सर्वोपरि ही रहता है। कांग्रेस के पतन पर क्या बोले नेगी नीचे वीडियो में देखें। मगर लौटकर। उससे पहले इस पोस्ट को बॉटम तक पूरा पढ़ें।

श्याम सरन नेगी ने पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव में वोट डाला है। बातचीत के दौरान उनकी जुबान पर कुछ नेताओं के नाम बार बार आ रहे थे। बार बार जिक्र हुआ लाल बहादुर शास्त्री का। शास्त्री के बारे में नेगी कहते हैं कि वह बहुत जल्दी इस दुनिया से चले गए लेकिन उन्होंने कम समय में बहुत कार्य किए। उसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी का जिक्र होता है।

श्याम सरन नेगी का घर

वे महात्मा गांधी के कत्ल का भी जिक्र करते हैं। मगर जब उनसे पूछा कि आपको क्या लगता है इस बार किसकी सरकार आएगी तो वह बोले इस बार मुकाबला नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी में है।

किन्नौर के कुछ गांव और संस्थान देखने का मौका मिला, कई नए दोस्त बने, नीचे फोटो में देखें

यह है JNV School रिकोंग पियो। किन्नौर का नंबर1 स्कूल। प्रिंसिपल एके श्रीवास्तव सर के प्रयासों का ही नतीजा है कि अब यहां किन्नौर जिले की सबसे बड़ी बिल्डिंग तैयार हो रही है। बिल्डिंग से स्कूल की केपेसिटी बढ़ जाएगी।


स्कूल देखने गया था। प्रिंसिपल एके श्रीवास्तव सर ने कहा डिनर करके ही जाने देंगे। मैं जेएनवी ऊना से पढ़ा हूं। ऐसे में जेएनवी का यह कनेक्शन तो हमेशा ही रहता है। जो नहीं जानते उन्हें बताना चाहता हूं कि जेएनवी यानी जवाहर नवोदय विद्यालय। संभवतः हर जिले में एक बोर्डिंग स्कूल। मामूली सी फीस लेकर छठी से 12वीं तक की टॉप-क्लास पढ़ाई। खाना, पीना, रहना, किताबें सब उसी मामूली फीस में। सीबीएसई बोर्ड। 10वीं और 12वीं में दशकों से टॉपर जेएनवी ही रहा है। यह मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा सीधे नियंत्रित किए जाते हैं। यानी स्कूलों में देखा जाए तो आईआईटी, एनआईटी जैसा रुतबा है जेएनवी का। यह किन्नौर ट्रिप का बहुत यादगार हिस्सा था। ऊपर फोटो में डाइनिंग टेबल पर हमारे साथ फिजिकल एजुकेशन टीचर प्रीति भी मौजूद हैं। ट्रैकसूट में। प्रीति भी जेएनवी ऊना से पास आउट हैं।


डीसी गोपाल चंद, रिकोंग पियो जिला मुख्यालय में डीसी गोपालचंद से भी मुलाकात हुई। उनसे चुनाव की तैयारियों और किन्नौर में हो रहे पर्यावरण बदलाव के प्रभावों पर चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि पूरे किन्नौर जिले में लगभग 58000 वोटर्स हैं। एक गांव है ‘का’ (KAA) वहां जो पोलिंग बूथ बना है वहां महज 16 वोटर रजिस्टर्ड हैं। 16 के लिए पोलिंग पार्टी जा रही है। एक जो खास बात उन्होंने किन्नौर के चुनाव के बारे में बताई वह थी आजतक किन्नौर में चुनाव के दौरान कभी भी हिंसा नहीं हुई। ऐसे में सेंसटिव बूथ भी कोई नहीं है। हालांकि वोटरों की गिनती जहां जहां ज्यादा है वहां सुरक्षा के इंतजाम थोड़ा ज्यादा किए गए हैं। मगर किन्नौर देवभूमि है। लोग शांतिप्रिय और धैर्यवान हैं।

यह संयोग ही था कि मैं जहां जहां पहुंचा वहां कोई न कोई कार्यक्रम हो रहा था। एक पार्टी में मुझे किन्नौरी टोपी भेंट की गई।

उर्नी गांव जब पहुंचा तो पूरा गांव श्रीमती कमसिन नेगी की रिटायर्मेंट पार्टी लुत्फ ले रहा था। किन्नौर के लोग दिल खोल कर खर्च करते हैं। पार्टीज भी लैविश होती हैं। असली शो रात को शुरू होना था मगर मुझे वहां से निकलना था इसलिए मैं पार्टी में ज्यादा देर रुका नहीं। मुझे उन्होंने विशेष अतिथि की तरह ट्रीट किया। बेहद खास किन्नौरी टोपी भेंट की। बादाम और अखरोट की मालाएं पहानाईं। ऐसा मैं पहली बार अनुभव कर रहा था। फोटो में बाएं से मेरी बगल में रिटायर्ड लेक्चरार कमसिन मैडम, उनकी रिश्तेदार और बिलकुल दाईं ओर खड़े हैं पर्यावरणविद् गुरुजी रामानंद नेगी। नेगी साहब से मैं एक स्टोरी के सिलसिले से मिलने गया था। यहां बादाम की खीर और किन्नौरी पारंपरिक भोजन भी किया।

पर्यावरण प्रेमी पूर्व आईएएस आरएस नेगी और दुर्गाचंद किन्नौर को बचाने की मुहीम में जुटे हैं

अपनी किन्नौर यात्रा के दौरान मै वहां के स्थानीय लोगों से मिला। किन्नौर में पर्यावरण बदलाव की समस्या हर साल बढ़ती जा रही है। लोगों में जागरुकता कम है। हर साल मौसम में बदलाव आ रहा है। इन सर्दियों कई सालों बाद रिकोंगपियो और मध्य किन्नौर में अच्छी खासी बर्फबारी हुई है। हर साल सेब के बगीचो तो बढ़ रहे हैं लेकिन पैदावार घटती जा रही है। विश्व प्रसिद्ध ड्राईफ्रूट चिलगोजा भी गायब हो रहा है। पहाड़ों पर लैंड स्लाइड जारी है। इन समस्याओं का एक बड़ा कारण है वहां के हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट। लोगों को जागरुक करने का बीड़ा उठाया है महाराष्ट्र कैडर के 1977 बैच के आईएएस अफसर (रि) आरएस नेगी ने। नेगी का साथ देते हैं दुर्गा चंद। नेगी साहब हिम लोक जागृति मंच और जिला वन अधिकार समिति नाम की संस्थाओं के जरिए लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरुक कर रहे हैं। नेगी कहते हैं कि हम विकास तो चाहते हैं लेकिन ऐसा न हो कि विकास के चक्कर में किन्नौर ही खत्म हो जाए। प्रोजेक्ट के दुष्प्रभाव दिखने लगे हैं। (इस मुद्दे पर अलग स्टोरी लिख रहा हूं)

पांगी में भयंकर लैंड स्लाइड से गांव पर खतरा मंडरा रहा है

ऐतिहासिक गांव पांगी के लोग सहमे हुए हैं
पांगी गांव के रवि राज नेगी

रिकोंग पियो से लगभग 8 किमी दूर है ऐतिहासिक गांव पांगी। यह भी किन्नौर का एक प्रमुख गांव है। यहां कुछ साल पहले भयंकर लैंड स्लाइड हुआ था। गांव का एक हिस्सा ही पहाड़ से अलग हो गया था। घर ढह गए। जो घर बचे हैं उनमें रहने वाले लोग भी डरे हुए हैं। घरों में दरारें आ रही हैं। सदियों से लोग यहां रह रहे हैं लेकिन कभी भी ऊंची चोटियों से पत्थर गिरने की घटनाएं नहीं हुई थींं। यहां के सशक्त युवा और डिस्ट्रिक्ट यूथ एसोसिएशन एंड वेलफेयर सोसाइटी के जनरल सेक्रेटरी रवि राज नेगी का दावा है कि पहाड़ की ऊपर की चोटियों से अब पत्थर गिरने लगे हैं। पहाड़ के नीचे सुरंगे निकालने के चलते पहाड़ खोखला हो गया है और ब्लास्टिंग से अस्थिर होने लगा है।

सेब की बात नहीं की तो किन्नौर जाने का क्या फायदा

सेब के बाग
अब किन्नौर वासी लगभग 90 से 100 प्रतिशत खेतों में सेब के बाग लगाना चाहते हैं, श्याम सरन नेगी इस बात से परेशान हैं कि लोगों ने अब खुद अनाज बीजना बंद कर दिया है। बाहरी अनाज पर निर्भर हो रहे हैं। इससे कैंसर जैसी बीमारियां भी हिमालय की गोद में रहने वाले लोगों को हो रही हैं। नेगी कहते हैं कि कम से कम 50 प्रतिशत हिस्से पर अनाज बीजना चाहिए।

1960 के दशक में सेब किन्नौर की अर्थव्यवस्था में एक बड़ा हिस्सा बन गया था। दुनिया भर में किन्नौर के सेब मशहूर हैं। खासकर किन्नौर के गोल्डन और रॉयल एपल। अप्रैल मई में पेड़ों को फूल लग जाता है। सितंबर तक ये पक कर तैयार हो जाते हैं। फिलहाल शिमला और किन्नौर जिले सेब के सफेद फूलो से भर गए हैं। अब तो किन्नौर के सेब भारतीय मंडियों में पहुंचने शुरू हो गए हैं लेकिन कुछ साल पहले तक किन्नौरी सेब का ज्यादातर हिस्सा विदेशों में एक्सपोर्ट हो जाता था। भारतीयों की परचेजिंग पावर बढ़ी है। अब यह छोटे बड़े शहरों में पहुंचने लगा है। अगर आप किन्नौर आना चाहते हैं तो सितंबर के शुरू में प्लान करें। सितंबर मध्य या अंत में सेब के ट्रकों के चलते सड़क पर ट्रैफिक बढ़ जाता है।

इंद्रधनुष। किन्नौर के बेहद खूबसूरत गांव उर्नी से खींची गई इंद्रधनुष की फोटो
शाम को किन्नर कैलाश का दृष्य। सुबह भी चोटियों पर कुछ ऐसी ही लालीमा छाती है


किन्नौर के कई बड़े हाइडल प्रोजेक्ट जिंदल कंपनी के पास हैं। हिमाचल, पंजाब समेत लगभग 9 राज्य इसी किन्नौर से पैदा हुई बिजली से चल रहे हैं। किन्नौर सबको रौशन कर रहा है। मगर अभी भी पहाड़ के ये भोले भाले लोग अपने अधिकारों से वंचित हैं। यह महज कोरा एक्टीविजम नहीं है। प्रोजेक्ट्स से मैदानी इलाकों का तो विकास हो रहा है लेकिन यहां पैदा बिजली की रॉयलटी हो या प्रोजेक्ट्स में नौकरियों के वादे। कंपनियां और सरकार। दोनों मिलकर यहां के लोगों का शोषण कर रहे हैं।

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