1971 युद्ध के हीरो को भूली सरकार, वीर चक्र कैप्टन हरभजन को श्रद्धांजलि देने प्रशासन से कोई नहीं गया


साथी फौजी बोले मीडिया के लिए एक्टर के बेटे तैमूर का जुकाम तो सुर्खियां बनता है लेकिन वीर चक्र का निधन कोई मायने नहीं रखता


कैप्टन हरभजन को अग्नि देते उनके पुत्र कंवलजीत सिंह और बड़े भाई सूबेदार मेजर (रि) सुखदेव सिंह

शादी के सात दिन बाद ही सेना ने उन्हें भारत पाकिस्तान युद्ध में हिस्सा लेने बुला लिया था
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डीसी, एसडीएम या तहसीलदार समेत कोई जिला प्रशासन का अधिकारी डैकोरेटेड सैनिक को श्रद्धांजलि देने नहीं पहुंचा

रवि रौणखर. जालंधर

दोआबा की धरती एक वीर चक्र विजेता से वंचित हो गई है। 1971 भारत पाकिस्तान युद्ध के हीरो। 4 सिख रेजिमेंट के ओनरेरी कैप्टन वीर चक्र हरभजन सिंह अटवाल हमें छोड़कर जा चुके हैं। वे 72 वर्ष के थे। 6 जनवरी को उनकी मौत हुई और 11 जनवरी को उनका अंतिंम संस्कार उनके पैतृक गांव (खुर्दपुर) आदमपुर में किया गया। हैरानी की बात है कि जिला प्रशासन की ओर से कोई भी अधिकारी, सरकार का कोई मंत्री, सांसद या सत्ताधारी पार्टी का कोई विधायक योद्धा के अंतिंम संस्कार में शामिल नहीं हुआ। सत्ता पर काबिज नेताओं और आला अधिकारियों की यह बेरूखी हमें सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्या उनके पास उस वीर को अंतिंम श्रद्धांजलि देने तक का समय भी नहीं था। वीर चक्र की नागरिक सम्मान से तुलना करें तो सीनियोरिटी में यह पद्मभूषण के समान है। वीर चक्र यूं ही किसी को नहीं मिल जाता। सैनिक इसे अपने खून से सींचकर प्राप्त करता है। कैप्टन हरभजन सिंह को यह सम्मान 15 अगस्त 1972 को उस वक्त के सुप्रीम कमांडर और राष्ट्रपति वीवी गिरि ने दिया था।

कैप्टन हरभजन सिंह की पत्नी मनजीत कौर

शादी के सात दिन बाद ही जंग पर रवाना हो गए थेः    पत्नी मनजीत कौर

आपको बॉर्डर फिल्म का वह सीन तो याद होगा जब सुनील शैट्टी को शादी वाले दिन ही खबर मिलती है कि लड़ाई शुरू हो गई है। अगली सुबह ही वह देश की रक्षा के लिए ट्यूटी पर लौट जाता है। असल में 1971 भारत पाकिस्तान युद्ध के हालात मार्च 1971 में शुरू हो गए थे। कैप्टन हरभजन सिंह की शादी जून महीने में हुई। सेना ने ईस्टर्डन फ्रंट( बांग्लादेश बॉर्डर) पर सैनिकों को जुटाना शुरू कर दिया था। शादी के आठवें दिन वे जंग में हिस्सा लेने रवाना हो गए। उनकी पत्नी मनजीत कौर बताती हैं कि शादी को अभी सात दिन ही हुए थे कि वे चले गए। बीच बीच में एक दो चिट्ठियां भी आईं। मगर वापसी 1972 में हुई। बाजू पर प्लास्टर था। जांघ भी चोटिल थी। मगर सीने पर वीर चक्र था। हर तरफ उनकी वीरता के चर्चे थे। कुछ दिन ही तो हम साथ रहे थे। इसलिए जब वे सात महीने बाद लौटे मैं उन्हें पहचान भी नहीं पाई। तब वे तीन महीने छुट्टी पर रहे थे। फिर बॉर्डर पर वापस चले गए।

मामले को पब्लिक में लाने वाले वारंट अफसर (रि) सुम्मित्तर सिंह सैनी (फोटो रवि)

आदमपुर एयरपोर्ट पर कोई नेता आ जाए तो हाथों में फूल लिए नेता अफसर लाइन में लग जाते हैः

आदमपुर एयरपोर्ट पर जब कोई छोटा बड़ा नेता आता है तो उसका स्वागत करने (तथाकथित प्रोटोकोल के तहत) अधिकारियों से लेकर नेताओं की फौज जमा हो जाती है। सभी हाथों में गुलदस्ते लेकर नेताजी का स्वागत करते हैं। लेकिन जब एक वीर चक्र का निधन होता है तो वहां कोई नहीं जाता। आदमपुर एक्स सर्विसमैन वेलफेयर सोसाइटी के प्रधान वायु सेना के वारंट अफसर (रि) सम्मित्तर सिंह बताते हैं कि वीर चक्र भारत का तीसरा सर्वोच्च वीरता सम्मान है। जिसकी वरीयता की तुलना पद्मभूषण से की जा सकती है। यूं तो किसी एक मौत की दूसरी मौत से तुलना करना सही नहीं लेकिन जब भी किसी बड़े नेता की मौत होती है तो राजकीय शोक रखा जाता है। अभिनेता, बिजनेसमैन या बड़ा कलाकार दुनिया से जाता है तो हर कोई उस दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि देने के लिए पहुंचता है। मीडिया में बड़ी बड़ी सुर्खियां बनती हैं। मगर जब किसी बड़े फौजी की मौत होती है तो सिर्फ सेना ही उसे सलामी देने आती है। कोई विरला रिटायर्ड फौजी ही होता है जिसकी शोक सभा में पूरा प्रशासन शामिल होता है। कैप्टन हरभजन सिंह कोई आम फौजी नहीं थे। वीर चक्र के साथ साथ वे ऑफिसर ट्रेनिंग अकेडमी (चेन्नई) के इंस्ट्रक्टर भी थे। सैकंड़ों फौजी अफसरों को उन्होंने ट्रेन्ड किया। उनसे ट्रेन्ड कई अफसरों ने कारगिल युद्ध में देश का मान बढ़ाया। अखबारों में तैमूर के जुखाम और खिलौनों की खबर भी सुर्खियां बनती हैं लेकिन वीर चक्र के स्वर्गवास को कोई अहमियत नहीं देता।

एक्स सर्विसमैन वेलफेयर सोसाइटी के सेक्रेटरी नायक (रि) ज्ञान सिंह संधू

एसएचओ अंत में आए लेकिन सैल्यूट फिर भी नहीं किया- संधू

एक्स सर्विसमैन सोसाइटी के सेक्रेटरी नायक (रि) ज्ञान सिंह संधू ने बताया कि जब कैप्टन साहब को अग्नि के हवाले किया जा चुका था तब जाकर इलाके के एसएचओ अपनी टीम के साथ आए। वे एक कोने पर खड़े रहे लेकिन वीर सैनिक को रिवायती सैल्यूट भी नहीं मारा। यह उनकी गलती भी नहीं है। सिर्फ फौज को ही कड़े अनुशासन की ट्रेनिंग दी जाती है। पुलिस को इसके बारे में क्या पता। यहां के विधायक पवन कुमार टीनू जरूर पहुंचे थे।

सेना अपने साथी को कभी नहीं भूलतीः शमशानघाट के बाहर सेना ने परिवार से कैप्टन साहब का पार्थिव शरीर अपने कंधों पर ले लिया

गोलियों की बौछार के बीच जाकर पाकिस्तानी बंकर नष्ट किएः

कैप्टन हरभजन सिंह जांबाज फौजी थे। उनके भाई सुबेदार मेजर (रि) सुखदेव सिंह बताते हैं कि भारत पाकिस्तान युद्ध में वे मुक्तिवाहिनी के साथ मिलकर ईस्ट पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में पाकिस्तानी सेना से युद्ध लड़ रहे थे। वे 4 सिख रेजमेंट में थे। भयंकर लड़ाई में दो बंकरों में से मशीनगन का हैवी फायर आ रहा था। वे अपनी कंपनी में सैक्शन कमांडर के तौर पर सैक्शन का नेतृत्व कर रहे थे। दुशमन का डिफेंस बेहद मजबूत था। उस वक्त वे लांस नायक थे। हरभजन ने लाइट मशीनगन अपने हाथों में ली और 300 यार्ड तक गोलियों की बौछार के बीचों बीच होते हुए बंकरों की ओर बढ़े। सुरक्षित स्थान पर पहुंचे और हैंड ग्रनेड से पहले एक फिर दूसरे बंकर को उड़ा दिया।  इस दौरान उन्हें बाईं जांघ और दाईं बाजू में गोलियां भी लगीं। बुरी तरह घायल हो गए। जान की परवाह नहीं की और अपने सैक्शन को सुरक्षित स्थान में लाकर दुशमन के रक्षाकवच को भेद डाला। उन्हें वहां से अस्पताल में भेज दिया। लेकिन वे अपने स्वभाव के मुताबिक कुछ हफ्तों में फिर से फिट हो गए। युद्ध में अपनी जान जोखिम में डाल दुश्मनों के दांत खट्टे करने के लिए उन्हें राषट्रपति वीवी गिरी से वीर चक्र का सम्मान मिला।

बाएं से बड़े भाई सूबेदार मेजर (रि) सुखदेव सिंह, पोते जुगराज और संजाप और दाएं पुत्र कंवलजीत सिंह अटवाल

दुख तो इस बात का है कि जिला प्रशासन से एक भी अधिकारी नहीं आया- बेटा कंवलजीत

कैप्टन साहब के इकलौते बेटे कंवलजीत सिंह ने बताया कि बठिंडा और जालंधर से दर्जनों सैनिक उन्हें आखिरी सलाम देने पहुंचे। घर से बाहर कुछ दूरी तक परिवार के सदस्यों के कंधे पर गए लेकिन बाद में सैनिकों ने उनके पार्थिव शरीर को अपने कंधों पर ले लिया। अंतिंम संस्कार पूरे सैन्य सम्मान के साथ किया गया। मगर हैरानी है कि मेरे पिताजी के संस्कार और बाद में भोग पर कोई सिविल एडमिनिस्ट्रेशन का अधिकारी नहीं आया।

कैप्टन हरभजन सिंह की पत्नी मनजीत कौर ने बताया कि उनके फौजी साथी अकसर पूछते थे कि साहब को किस चक्की का आटा खिलाया है

अक्सर जूनियर पूछते थे कि किस चक्की का आटा खिलाया है- मनजीत कौर

पत्नी मनजीत कौर भावुक होते हुए कहती हैं कि वे इतने ताकतवर थे कि एक बार रोड एक्सिडेंट में सिर पर बड़ी चोट लग गई। बिना उफ किए घर आए। मैने जब देखा कि घाव इतना गहरा है तो बोले छोटी सी ही तो चोट है। ऑफिसर ट्रेनिंग अकेडमी के रिक्रूट हों या उनके जूनियर साथी। सब मुझसे पूछते थे कि इन्हें किस चक्की का आटा खिलाते हैं।

98 वर्षीय सूबेदार मेजर (रि) दर्शन सिंह ने भी अपना बेटा देश पर न्योछावर किया है। संस्कार के वक्त सेना के पूर्व और मौजूदा अदिकारी उनका हाल जानते हुए।

कैप्टन हरभजन के परिवार ने देश को दो शहीद भी दिए हैं


कैप्टन हरभजन सिंह के परिवार में उनके चचेरे भाई महिंद्र सिंह 1962 के युद्ध में शहीद हुए थे। उनके चचेरे भाई सूबेदार मेजर (रि) दर्शन सिंह के बेटे सिपाही परमजीत सिंह 1965 के युद्ध के शहीद हैं। इनका पूरा परिवार देश के लिए समर्पित रहा है। कैप्टन हरभजन के श्रद्धांजलि समारोह में लेफ्टिनेंट जनरल (रि) जगबीर सिंह, ब्रिगेडियर (रि) सचदेवा, मेजर (रि) जगदीप सिंह, विधायक पवन कुमार टीनू, एक्स सर्विसमैन वेलफेयर सोसाइटी के सदस्य, कैप्टन (रि) प्रितपाल सिंह, सार्जेंट (रि) अजीत लाल, कैप्टन हरभजन सिंह के पोते जुगराज सिंह और संजाप सिंह भी शामिल हुए।

कैप्टन साहब का 6 जनवरी को अल्प बीमारी के बाद खुर्दपुर (आदमपुर) अपने निवास स्थान पर निधन हो गया था। बेटा उस वक्त इटली में था तो संस्कार 11 जनवरी को किया और अंतिंम अरदास व भोग 15 जनवरी को संपन्न हुआ।  जिला प्रशासन से कोई अधिकारी शामिल क्यों नहीं हुआ इस पर जालंधर पोस्ट ने डीसी वीके शर्मा से बात करने की कोशिश की   लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया।

कैप्टन हरभजन को वीर चक्र देते वक्त पढ़ा गया पत्र

संक्षिप्त जीवन परिचयः

ओनरेरी कैप्टन(रि) हरभजन सिंह अटवाल

यूनिटः 4 सिख रेजिमेंट

पिताः तारा सिंह

माताः नसीब कौर

पत्नीः मनजीत कौर

बेटाः कंवलजीत सिंह

पताः गांव खुर्दपुर (आदमपुर). जिला जालंधर

जन्मः 15-03-1947

सेना में भर्तीः 31-12-1964

युद्ध लड़ेः 1965 और 1971

मृत्युः 06-01-2019 (रात 02:30)

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